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Saturday, January 2, 2021

कहां अटकी पडी है हिन्दू बुद्धिजीवीओं की ट्रेन?


 

--- लैफ्ट के जेहादीओं से बनी टुकडे टुकडे गेंग को दिन-रात कोसने वाले हिन्दू बुद्धिजीवी उन्हीं जेहादीओं की मोडस ओपरेंडी को क्यों नहीं समजते? क्यों यह हिन्दू बुद्धिजीवी फूफा की मानसिकता से बाहर नहीं आते?

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n  अलकेश पटेल

 

भगवान श्रीकृष्ण सबसे शक्तिशाली थे। वह चाहते तो, न तो द्रौपदी का चीरहरण होता और ना ही महाभारत। श्रीराम अवतार थे। वह चाहते तो, न माता सीता का अपहरण होता और ना ही लंकेश के साथ युद्ध करना पडता। फिर भी यह सब कुछ हुआ। क्यों हुआ? श्रीकृष्ण और श्रीराम चाहते थे कि सभी मनुष्य अपनी अपनी शक्ति पहचाने और अपना अपना काम करें।

सृष्टि का हर जीव अपने जीवन के लिए और अपने बचाव के लिए संघर्ष करता है। कोई एक दूसरे पर आश लगाए बैठा नहीं रहता। क्यों?

हमारे धर्मशास्त्र भी हजारों उदाहरणों से समजाते है कि, दूसरों के उपर आश लगाए बैठे रहने के बजाय, दूसरों को कोसते रहने के बजाय तुम अपना काम करो।

लेकिन इसमें से किसी भी बात हमारे हिन्दू बुद्धिजीवी समज नहीं पाते है।

हिन्दू बुद्धिजीवीओं की ट्रेन वैसे तो बहुत लम्बी और मजबूत है। वह चाहे तो ऐसा रास्ता तय कर सकती है जहां तक कोई नहीं पहुँच सकता। यह ट्रेन उतने लोगों को अपने साथ ले सकती है जीतने लोगों की तो पोपुलेशन कईं सारे देशों की नहीं है। लेकिन यह ट्रेन स्टेशन के यार्ड में पडी है। दशकों से यह ट्रेन बस यही इंतजार में है कि कोई आए और उसे अपने कंधे पर उठा कर चले। यह बडी और शक्तिशाली ट्रेन खुद चलना नहीं चाहती। सिर्फ यार्ड में बैठे बैठे हिन्दू नेताओं, हिन्दू राजनैतिक पार्टीयां, हिन्दू संगठन – सभी को कोसती रहती है कि यह लोग उनको कंधे पे उठा के चलते क्यों नहीं?

हिन्दू बुद्धिजीवी 2014 से कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गए है। वह अपनी जानकारी पर, अपने ज्ञान पर खुद ही मुग्ध है। वह ऐसा मानते है और लिखते रहते है कि बीजेपी और संघ के नेताओं को उनके पास सुबह-शाम हाजरी लगानी चाहिए और उनको कंधे पर उठाके चलना चाहिए।

लेकिन ऐसा हो नहीं रहा। बीजेपी शासन में व्यस्त है, और संघ अपना काम कर ही रहा है। बीजेपी को अनेकों हमले झेलने है। उसे शासन में भी ध्यान देना है और लैफ्ट के जेहादीओं से भरे ऐडमिनिस्ट्रेशन पर भी नजर रखनी है। बीजेपी सरकार को विदेश नीति भी संभालनी है और शाहीनबाग और कथित-किसान आंदोलन से भी निपटना है।

 

हिन्दू बुद्धिजीवीओं को फूफा की मानसिकता छोडनी पडेगी

 

फिर भी गुजरात में और राष्ट्रीय स्तर पर पीछले छह वर्ष से मैं ऐसे हिन्दूवादीओं को देख रहा हूँ, सून रहा हूँ – जो भाजपा और मोदी को कोसते रहते है। शायद मोदी को सीधे सीधे नहीं कोसते लेकिन भाजपा से उस तरह नाराज रहते है जैसे शादी वाले घर में फूफा!

यह सभी हिन्दू बुद्धिजीवी फूफा - कहीं पत्रकार है, कहीं लेखक है, कहीं स्तंभकार है, कहीं टीवी में एक्सपर्ट के रूप में बैठे है। सभी मंच पर भाजपा, संघ और हिन्दू समाज के पक्ष में दबे स्वर में बोलने के बाद, लिखने के बाद ऐसा मान लेते है कि अभी भाजपा और संघ वाले आएंगे और उन्हें कंधे पर बैठाकर लाड लडाएंगे, सोने की थाली में खाना देंगे, कहीं किसी समिति में शामिल कर लेंगे, कहीं किसी कंपनी में डिरेक्टर बना देंगे, कोई संस्था का अध्यक्ष बना देंगे। और ऐसा नहीं होने पर भाजपा और संघ को कोसने लगेंगे, साथ ही भाजपा और संघ के प्रति सम्मान रखने वाले अन्य हिन्दूओं को भक्त और अंध-भक्त के संबोधित भी करेंगे, जो काम लैफ्ट जेहादीयों की गिरोह करती है।

 

आशा करोगे तो निराशा तो मिलनी ही है

 

मैं यह बात खास करके मेरे गुजराती लेखों में कम से कम दस वर्ष से लगातार कह रहा हूं की जो भी लोग भारतवर्ष और सनातन का भला चाहते है वह अपने अपने स्तर पर, अपनी अपनी शक्ति के मुताबिक काम करते रहे। ऐसा काम करते समय भाजपा या संघ या दूसके किसी पर आश लगाए बैठे रहने की जरूरत नहीं है। आशा करोगे तो निराशा अवश्य मिलनी ही है।

लेकिन मेरी बातों का अभी तक ज्यादा असर नहीं हुआ। कारण यह है कि, हिन्दु बुद्धिजीवी असल में खुद कुछ काम करना नहीं चाहते। वह सिर्फ ऐसा मान कर चलते है कि उनके बोलने से, लिखने से सब कुछ ठीक हो जाऐगा।

सबसे बडी कमनसीबी यह है कि इस तरह के हिन्दू बुद्धिजीवीओं को न तो घरेलु समस्याओं और राजनीति के बीच के रिश्ते के बारे में पता है, और न ही उन्हें जीओ-पोलिटिक्स के बारे में।

इस तरह के हिन्दू बुद्धिजीवी लैफ्ट के जेहादीओं से यह बात सीखने को तैयार नहीं है कि सरकार या संगठन की टीकाएँ करने के बजाय सामने से उनके पास जा कर उनके काम में सहयोग करें। लैफ्ट और मिशनरी जेहादीओं ने कभी कांग्रेस सरकारों की और कांग्रेस पार्टी की टीकाएँ नहीं की है, क्या यह बात हिन्दू बुद्धिजीवी देख और समज नहीं पाते?

सच तो यह है कि हिन्दु बुद्धिजीवीओं को अपनी मुग्धता से नीचे उतर कर सरकार, पार्टी और सामान्य जनता के साथ काम करना चाहिए। (लैफ्ट और मिशनरी जेहादी उनके खेमें मे यही करते है)

इस तरह के हिन्दू बुद्धिजीवीओं को यह बात समझनी ही पडेगी कि उनके लिख देने से, उनके बोल देने से परिवर्तन नहीं आ जाता। खुद काम करने से परिवर्तन होता है। आपका लिखा हुआ और आपका बोला हुआ 200 – 500 - 1000 लोग पढते-सुनते है। और यह लोग भी आप की एक ही बात बार-बार सुनने के बाद उब जाते है, और वह संख्य कम होती जाती है। उससे विरुद्ध लैफ्ट-मिशनरी जेहादी उनसे सहानुभूति रखनेवाली सरकार के पास जा कर बैठते है, उनसे सहानुभूति रखनेवाली राजनैतिक पार्टी के पास जा कर बैठते है, उनसे सहानुभूति रखनेवाली जनता के बीच जा कर बैठते है – और उस तरह उनका दबदबा बना रहता है, उनका इको-सिस्टम बना रहता है और तब जा कर पद मिलते है, या फिर अपने मन चाहे काम करवा सकते है।

टीका-टिप्पणीयाँ करने से कुछ हासिल नहीं होगा। आपको कुछ भी बदलाव लाना है, आप कुछ भी बदलाव चाहते है तो उसमें शामिल होना ही पडेगा। और शामिल नहीं हो सकते हो तो टीका-टिप्पणीयाँ करके हिन्दूओं में फूट डालना बंद करो। अगर आपको लगता है कि हर समय पार्टी और संगठन को गाली देने से सब कुछ ठीक हो जाऐगा, तो मुझे बजे दुख के साथ कहना पडता है कि आपकी बुद्धिमत्ता पूरी बेकार है।

अगर आप सही में परिवर्तन चाहते है तो मोदी सरकार ने बहुत सारे संकेत दिए है। अगर वह संकेत समझ नहीं सकते हो तो आपका कुछ नहीं हो सकता। हरि ओम।

Wednesday, April 24, 2019

मेरे प्यारे बेगुसराई वासीओं...


अथ श्री अध्याय 19
मेरे प्यारे बेगुसराई वासीओं...

--- अगली 29 तारीख को, यानी आने वाले सोमवार को आप अपना लोकसभा का प्रतिनिधि चूनने जा रहे हैं...उस वक्त इतना ख्याल रखना कि -

--- अलकेश पटेल
 - कि आपका वोट, आपका अमूल्य मत बेकार चला न जाए।

प्यारे बेगुसराई वासीओं, वैसे मैं जानता हुं कि आप बहुत ही समजदार है और मतदान करते वक्त कभी ऐसा निर्णय नहीं लेंगे जिससे देश के टुकडे करनेवाली सोच को बढावा मिले।

आपने 2014 के चुनाव में भी समजदारी भरा निर्णय ही लिया है, लेकिन इस बार आपसे मतदान से पहले बात करना जरूरी लग रहा क्योंकि इस बार का वामपंथी उम्मीदवार कन्हैया देशद्रोह का आरोपी है, उस पर केस चल रहा है, लेकिन वामपंथी हमेशा जूठे होते है, इसलिए कन्हैयाने वहां किसी को यह बताया नहीं होगा। और वामपंथीओं कि गुलामी करने वाले मीडिया वालों ने भी आप लोगों से इस बात को छूपाया होगा कि कन्हैया के खिलाफ देशद्रोह का केस चल रहा है। (यह रहे उस बात के प्रमाणः 

यह तो हुई तथ्यों की बात। अब जरा तर्क की बात भी कर लेते है।

मैं खास करके बेगुसराई की युवा पीढी से बात करना चाहता हुं। यह जो वामपंथी कन्हैया कुमार आपके यहां उम्मीदवारी कर रहा है, वह आपको युवा नेता के नाम से बहका सकता है और आपको गलत निर्णय लेने के लिए उक्सा सकता है।

लेकिन इसकी पहली हकीकत यह है कि, यह कन्हैया गत वर्ष तक देश के करदाताओं के पैसे से दिल्ही की जवाहरलाल युनिवर्सिटी (जे एन यु) में मुफ्त में पढ रहा था। दरअसल वो पढाई के नाम पर जे एन यु जैसी शिक्षा संस्था का वातावरण देश विरोधी करने में लगा था, और हम सब की बदनसीबी के कारण उस काम में उसे थोडी सफलता मिली भी है।

पर अब यह सब नहीं चलने देना चाहिए। ऐसे लोगों को चुनाव में बुरी तरह हरा कर उनका स्थान दिखा देना चाहिए। यह वामपंथी सिर्फ इसलिए चुनाव लड रहा है कि उसके कारण वह पुलिस और न्यायतंत्र पर दबाव बनाके अपने खिलाफ चल रहे देशद्रोह के केसों को रफादफा करवा सके। क्या बेगुसराई के मतदाता कन्हैया के इस मलिन इरादे को सफल होने देंगे? मुझे विश्वास है, ऐसा कभी नहीं होगा।

अब मैं आप सबको वामपंथी विचारधारा क्या है और क्यों मानवजात के लिए यह विचारधारा सबसे बडा खतरा है वह थोडे से शब्दों में बताना चाहता हुं।

वामपंथ वो विचारधारा है जो हिन्दु धर्म से और भारतीय संस्कृतिने बेहद नफरत करती है। यह लोग बाहरी तौर पर ऐसा कहते है कि वह धर्म कि राजनीति करना नहीं चाहते और सिर्फ गरीबों कि उन्हें चिंता है... लेकिन सच बात यह है कि ये सब दिखावा है, छलावा है। यह वामपंथी सिर्फ हिन्दुत्व से – हमारी सनातन संस्कृति से ही नफरत करते है, इस्लाम और इसाईओं के साथ इन वामपंथीओं का बडा याराना है। इसका कारण यह है कि यह लोग दूसरे किसी भी धर्म के खिलाफ बोलेंगे तो ठोक दिए जाएंगे यह बात उनको मालुम है, लेकिन हिन्दुत्व के खिलाफ बोलने में इन्हें कोई खतरा नहीं, क्योंकि हिन्दु हिंसा में विश्वास नहीं करते।

कन्हैया जैसे वामपंथी लोग विदेशी इतिहास और विदेशी संस्कृति को ही सही मानते है और भारत के लोगों पर भी वह विदेशी इतिहास और संस्कृति लादना चाहते है।

कन्हैया जिस पार्टी का सदस्य है वही लोग है जो झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र के कुछ इलाके, ओडिशा के कुछ इलाके में नक्सलवादी हिंसा का समर्थन करते है। नक्सलवादीओं के हाथों जब हमारी सेन, सीआरपीएफ और पुलिस के जवान शहीद होते है तो यही कन्हैया जैसे लोग जश्न मनाते है।

यह लोग भारत के ज्यादातर शहरों में हिन्दी, संस्कृत और राज्यों कि स्थानिक भाषाओं का विरोध करके अंग्रेजी लादते है जिसके कारण हमारी मूल भाषाओं कि पाठशालाएं बंद हो रही है और अंग्रेजी पाठशालाएं खूल रही है। इसके पीछे कन्हैया जैसे वामपंथीओं का ही हाथ है। अंग्रेजी शिक्षण के कारण भारत के बच्चे भारत की मूल संस्कृति, भारत के मूल धर्म के बारे में पढने से वंचित रहते है और धीरे धीरे वामपंथीओं के गुलाम हो जाते है।

मैं पूरे बेगुसराई वासीओं और खास करके युवाओं को बिनती करता हुं कि, कन्हैया और उसकी पार्टी के लोग सभा करने आए तो उनको कुछ सवाल पूछना, कि (1) व्लादिमीर लेनिन, जोसेफ स्टालिन और माओ कि असलियत क्या है? (2) इन तीनों वामपंथीओंने कितने करोड मानवों की हत्या कि है? (3) दुनिया के कौन से देश में वामपंथी विचारधारा हिंसा के बगैर सफल हुई है? और (4) इन वामपंथीओं को पूछना कि पश्चिम बंगाल में आप लोगों कि गठबंधन सरकार 30 साल तक शासन करतीं थी, तो आज भी पश्चिम बंगाल में गरीबी, बेकारी, भूखमरी और शिक्षा का स्तर इतना नीचा क्यों है?

साथीओं, मैं आपको विश्वास के साथ कहता हुं कि कन्हैया और उसके समर्थक या फिर उसको सपोर्ट करने वाले मीडिया वाले इन चार प्रश्नों का जवाब नहीं दे पाएंगे और शायद भाग जाएंगे।

इन वामपंथीओं के बारे में मैं बहोत कुछ लिख सकता हुं और सबके प्रमाण दे सकता हुं, लेकिन अब चुनाव नजदीक आ गया है तो आप सबको और खास करके युवा पीढी को सावधान करना चाहता हुं।

आप सब के लिए राष्ट्र का हित सर्वप्रथम होना चाहिए।

यह राष्ट्र है जो हम सब का पालन करता है। इस राष्ट्र के कारण ही हमारी पहचान है।

हमारे सुरक्षा बल राष्ट्र कि रक्षा के लिए लडते है, और यह कन्हैया जैसे वामपंथी हमारे सुरक्षा बलों के खिलाफ जेहादी आतंकीओं और नक्सलवादीओं का समर्थन करते है।

वामपंथी जेहादी आतंकिओं से कम खतरनाक नहीं है। फर्स सिर्फ इतना है कि जेहादी को पहचाना जा सकता है, लेकिन यह वामपंथी हमारे बीच आ कर चुनाव प्रचार करते है तभी ज्यादातर लोग उन्हें और उनकी हिंसक मानसिकता को नहीं पहचान सकते। सावधान !